रायबरेली। ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’! यह शिकायत है उस नन्हीं सी जान की है जिसने चंद घंटे पहले परमात्मा की रची इस रंग-बिरंगी दुनिया में आंखें खोली हैं। धरती माता के आंचल की छांव में डालकर वह कलयुगी मां भी अलविदा कह गई जिसने नौ महीने तक बोझ और पाप समझकर अंजाने में अपना खून-पानी देकर गर्भ में उसकी रक्षा और सुरक्षा की। इस मां ने तो ‘मां’ शब्द को कलंकित कर दिया। ‘माँ’! यह वह अलौकिक शब्द है जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है। हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वत: उमड़ पड़ता है। ‘माँ’ वह अमोघ मंत्र है जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। माँ की ममता और उसके महिमा के आंचल को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। शायद इसीलिए यह कहावत बनी कि ‘पूत कपूत सुने हैं लेकिन माता नहीं कुमाता’ लेकिन यह कहावत अब इस युग में झूठी साबित हो रही है। वैसे हर युग में लोगों की सोच बदल जाया करती है। चाणक्य ने कहा है कि ‘समय आने पर स्त्रियां अपने स्वार्थ के लिए अपनी कोख से जन्म लेने वाली संतान को भी मार डालती हैं।’ चाणक्य की यह बात आज सौ फीसदी सच दिखाई दे रही है। पैदा होते ही बच्चों को फेंक देने वाली कू्रर मां ने दुधमुंहे मासूम को यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि हमें ऐसी बदजात मां नहीं चाहिए। शहर कोतवाली क्षेत्र के मामा चौराहे के पास झाडिय़ों में एक नवजात झोले में पड़ा मिला। लोगों ने रोने की आवाज सुनकर पुलिस को जानकारी दी। पुलिस ने नवजात को जिला अस्पताल में भर्ती कराया है।
समाज में जब इंसानियत, मानवता और सामाजिक सरोकारों की मइयत निकलने लगी तो झोले में बंद नन्ही सी जान इस असार संसार की रचना करने वाले से अपना दर्द बयां करती है। उसका परमात्मा से और परमात्मा की बनाई दुनिया में आने के बाद खुद को भगवान मान लेने वालों से सवाल है कि लोग बच्चे के अपने परिवार में जन्म लेने पर खुशहाली मनाते हैं, मंगलगान करते हैं, और गर्व से इतराते हैं लेकिन मेरे धरती पर आंखें खोलते ही मुझे फेंका क्यों? आखिरकार मेरा अपराध क्या है? कर्म से भाग्य बनते हैं और दुर्भाग्य दुष्कर्मों से दुर्भाग्य साथ हो लेता है। आखिर मैंने चंद घंटों में क्या दुष्कर्म किया जो मुझे जन्म देने वाली मां मुझे इस तरह फेंक कर चली गई? नवजात शिशु के मिलने की यह घटना गुरूवार को चर्चा का विषय बनी रही।अन्देशा लगाया जा रहा है कि लोक लाज के भय से किसी ने शिशु को सडक़ के किनारे झोले में रखकर फेंक दिया। माँ के नाम को कलंकित कर रही कुछ कलयुगी मांए हैं जिन्होंने मानवता को शर्मशार कर दिया है। हालांकि माँ शब्द तो आज भी पवित्र है क्योंकि और माँ नहीं होती बल्कि माँ बनती है। आज की चंद स्वार्थी औरतें हैं जो माँ शब्द को कलंकित कर रही हैं।














