- ज्ञानेन्द्र वत्सल गीतकार
लखीमपुर उत्तरप्रदेश
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सुन री लेखनी इन बातों को प्रेम ग्रंथ सा लिख दे आज ।
अन्तरमन के उद्गारों को प्रेम पंथ सा लिख दे आज।।
पहली बारिश की बूँदों का प्रथम निमंत्रण सौपा तुमको ।
बदले मे उपहास दिया है क्या करना है इसका मुझको ।।
नेह साधन में खोया हूँ मुझे संत सा लिख दे आज।
अन्तरमन के उद्गारों को प्रेम पंथ सा लिख दे आज।।
मन का कोना कोना कहता होगा कुछ बदलाव तुम्हीं में ।
महफिल महफिल गीत सुनाना छुप जायेंगे घाव उन्हीं में ।।
ऐसा कोई गीत लिखा जो दर्द अंत सा लिख दे आज।
अन्तरमन के उद्गारों को प्रेम पंथ सा लिख दे आज।।
तारों की चुनरी ओढ़े तू मुधयामिन सी आती है ।
मैं तो बस सिसकी भरता हूँ तू आकर गा जाती है ।।
विश्व करे रसपान जिसे वो गीत मंथ सा लिख दे आज ।
अन्तरमन के उद्गारों को प्रेम पंथ सा लिख दे आज।।
मंथ- सोमरस
(साभार-फेसबुक वाॅल से)














