गुटनिरपेक्षता कोई अचानक उपजा हुआ विचार नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक शोषण, युद्ध और राजनीतिक अधीनता के अनुभव से निकली एक ऐतिहासिक चेतना थी। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वतंत्र देशों के सामने यह स्पष्ट था कि केवल झंडा और संविधान पा लेना ही वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है। यदि नीतिगत फैसले अब भी बाहरी शक्तियों के दबाव में लिए जाएँ, तो संप्रभुता खोखली रह जाती है। इसी समझ से जवाहरलाल नेहरू, गमाल अब्देल नासिर और योसिप ब्रोज़ टीटो जैसे नेताओं ने शीत युद्ध की गुटबंदी से दूरी बनाने का रास्ता चुना और विश्व राजनीति की उस संरचना को चुनौती दी जिसमें ताकतवर देशों की निष्ठा ही वैधता का पैमाना मानी जाती थी। 1955 का बांडुंग सम्मेलन और 1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना इस वैकल्पिक सोच की औपचारिक अभिव्यक्ति थे। इसका उद्देश्य किसी नई विचारधारा को थोपना नहीं था, बल्कि उस धारणा को अस्वीकार करना था कि सुरक्षा और विकास केवल सैन्य गठबंधनों और शक्ति संतुलन के माध्यम से ही संभव हैं। गुटनिरपेक्षता ने यह तर्क रखा कि दूरी बनाए रखना, संयम बरतना और नैतिक सिद्धांतों पर जोर देना भी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यह दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित था कि अंतरराष्ट्रीय वैधता केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक दावों और राजनीतिक स्वीकृति से भी निर्मित होती है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन द्वारा उठाए गए सिद्धांत सजावटी नहीं थे। संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व जैसे विचार उस असमानता को उजागर करने के लिए थे, जिसके तहत शक्तिशाली देश अपने हस्तक्षेप को जिम्मेदारी या अनिवार्यता बताकर सही ठहराते हैं, जबकि कमजोर देशों के प्रतिरोध को अव्यवस्था या विद्रोह कहा जाता है। गुटनिरपेक्षता ने इस नैतिक असंतुलन को पलटने का प्रयास किया और यह कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता किसी एक शक्ति के एकाधिकार में नहीं हो सकती। इस आंदोलन की संरचना भी अपने आप में राजनीतिक वक्तव्य थी। न तो कोई स्थायी नेतृत्व था और न ही बाध्यकारी आदेश। सहमति और बारी-बारी से नेतृत्व का सिद्धांत जानबूझकर अपनाया गया ताकि आंतरिक वर्चस्व से बचा जा सके। आलोचकों ने इसे कमजोरी कहा, लेकिन इसे शक्ति के केंद्रीकरण पर एक नैतिक नियंत्रण के रूप में भी देखा जा सकता है। यह एक ऐसी राजनीति थी जो दक्षता से अधिक समानता को, अनुशासन से अधिक आवाज को और आदेश से अधिक वैधता को महत्व देती थी। शीत युद्ध के दौर में गुटनिरपेक्षता केवल नैतिक मुद्रा नहीं रही, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उपयोगी सिद्ध हुई। भारत, यूगोस्लाविया और क्यूबा जैसे देशों ने इस स्थिति का उपयोग करते हुए बिना औपचारिक अधीनता स्वीकार किए राजनीतिक और आर्थिक लाभ हासिल किए। संयुक्त राष्ट्र में गुटनिरपेक्ष देशों ने उपनिवेशवाद, रंगभेद और परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे मुद्दों पर सामूहिक दबाव बनाया और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार की मांग को आवाज दी। हालांकि आंदोलन के भीतर मतभेद भी उभरे। सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में हस्तक्षेप या वियतनाम द्वारा कंबोडिया में की गई कार्रवाई जैसे मुद्दों पर गहरी बहस हुई। ये बहसें विफलता नहीं थीं, बल्कि इस बात का प्रमाण थीं कि गुटनिरपेक्षता अपने सिद्धांतों को सत्ता के नाम पर आसानी से त्यागने को तैयार नहीं थी। यह वह क्षण था जब नैतिक निर्णय की कीमत स्पष्ट रूप से सामने आई। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल गई। दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने की जगह घटती दिखी और गुटनिरपेक्षता को अप्रासंगिक घोषित किया जाने लगा। इसकी जगह रणनीतिक स्वायत्तता जैसी अवधारणाएँ उभरीं, जिनका अर्थ मौजूदा शक्ति संरचना के भीतर लचीलापन रखना था। लेकिन गुटनिरपेक्षता इससे अलग थी। वह केवल विकल्प चुनने की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि गुटों की वैधता पर ही सवाल उठाती थी। आज भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। जब यह एकतरफा प्रतिबंधों, शासन परिवर्तन की नीतियों या सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करता है, तो वह किसी नई सुरक्षा व्यवस्था का दावा नहीं करता, बल्कि शक्ति से जवाबदेही की मांग करता है। यह उस धारणा को चुनौती देता है कि शक्तिशाली देशों के कदम स्वतः नैतिक होते हैं। इसी अर्थ में गुटनिरपेक्षता वैश्विक राजनीति की उस भाषा को बाधित करती है जिसके माध्यम से शक्ति स्वयं को अपरिहार्य बताती है। यह सच है कि आंदोलन के भीतर विरोधाभास हैं। कई सदस्य देश स्वयं उन सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं जिनका वे दावा करते हैं। लेकिन असंगतियाँ किसी विचार को अर्थहीन नहीं बनातीं। गुटनिरपेक्षता का मूल्य इस बात में नहीं है कि वह पूरी तरह निर्दोष है, बल्कि इस बात में है कि वह ऐसे मानक प्रस्तुत करती है जिनके सामने शक्ति को स्वयं को सही ठहराना पड़ता है। गुटनिरपेक्षता आज भी एक जीवित तर्क है। यह इस बात पर जोर देती है कि स्वायत्तता कोई उपहार नहीं, बल्कि दावा है। कि संप्रभुता आज्ञाकारिता की शर्त पर नहीं दी जा सकती। और कि छोटे और कमजोर देश केवल बड़ी शक्तियों की रणनीति के मोहरे नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक कर्ता हैं जो विश्व राजनीति की भाषा को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। ऐसी दुनिया में जहाँ शक्ति को अक्सर नियति की तरह पेश किया जाता है, गुटनिरपेक्षता अब भी असहमति की भाषा को जीवित रखे हुए है।














