आशीष सिंह
भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन में तस्वीरें अब केवल किसी सुखद पल की स्मृति नहीं रहीं। वे एक ऐसी दृश्य राजनीति बन चुकी हैं जिसे दलाल सबसे अधिक समझते और सबसे अधिक साधते हैं। प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ फोटो खिंचवाना अब व्यक्तिगत अभिरुचि नहीं, बल्कि सामाजिक वैधता हासिल करने की संगठित तकनीक है। मंचों, समारोहों या भीड़भाड़ वाले आयोजनों में ऐसे क्षणों को पकड़ लेना वे एक निवेश की तरह देखते हैं, जिससे वे आगे अपना नैरेटिव गढ़ते हैं और अपने वास्तविक आचरण को पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं। समाजशास्त्र में प्रतीकों की शक्ति को अक्सर सबसे टिकाऊ माना गया है। पियरे बुर्दियो द्वारा वर्णित सांस्कृतिक पूंजी का यह सबसे सरल पर सबसे प्रभावी रूप है। तस्वीरें व्यक्ति को एक ऐसी पहचान दे देती हैं जो उसके वास्तविक व्यवहार, चरित्र और इतिहास से बहुत दूर हो सकती है। दलाल इन तस्वीरों के सहारे यह भ्रम रचते हैं कि वे किसी बड़े शक्ति-तंत्र के अनिवार्य घटक हैं, जबकि सच्चाई अक्सर इसके उलट होती है। सामाजिक दृष्टि में यही भ्रम वैधता का रूप ले लेता है और यह वैधता आगे चलकर उन्हें सामाजिक संरक्षण, अवसर और प्रभाव प्रदान करती है। भारतीय समाज में दृश्य प्रमाणों पर विश्वास करने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति किसी बड़े नेता, अधिकारी या प्रसिद्ध व्यक्ति के साथ दिखाई दे रहा है, उसका उस नेटवर्क से गहरा संबंध अवश्य होगा। दलाल इसी प्रवृत्ति को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं। उनकी तस्वीरें एक सामाजिक पासपोर्ट की तरह काम करती हैं। विरोधी, शिकायतकर्ता और यहां तक कि प्रशासनिक तंत्र के कुछ हिस्से भी ऐसे दृश्य प्रमाणों से प्रभावित हो जाते हैं और यह मान लेते हैं कि ऐसे ‘कनेक्टेड’ व्यक्ति से टकराना जोखिमभरा है। इस प्रकार तस्वीरें एक अदृश्य दहशत पैदा करती हैं और इसी दहशत में दलालों की शक्ति फलती-फूलती है। अपराध विज्ञान में तटस्थीकरण की जो तकनीक बताई जाती है, वह यहां पूरी तरह लागू होती है। व्यक्ति अपने दोषों और अपराधों को यह कहकर हल्का करने की कोशिश करता है कि यदि वह सच में गलत होता, तो इतने प्रभावशाली लोग उसके निकट क्यों होते। तस्वीरें इस तर्क को दृश्य रूप में पेश करती हैं। इससे लोगों में एक धारणा बनती है कि उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाना शायद अनुचित होगा। यह एक मनोवैज्ञानिक रक्षा कवच है जिसे दलाल पूरी सजगता से रचते हैं। छोटे शहरों में यह खेल और भी गहरा हो जाता है। यहां सामाजिक दूरी कम, और दृश्य छाप कहीं अधिक प्रभावी होती है। किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ ली गई एक तस्वीर वर्षों तक काम आती है। वह तस्वीर दलाल के लिए एक सामाजिक घोषणा पत्र की तरह हो जाती है कि वह स्थानीय सत्ता-संरचना का हिस्सा है। इसी भ्रम के चलते कई बार वास्तविक पीड़ित न्याय पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि शिकायत करने का कोई लाभ नहीं होगा। यह पूरा खेल नैरेटिव नियंत्रण का है। यह वह तकनीक है जिसमें व्यक्ति खुद की कहानी समाज को सुनाता है और समाज उसी कहानी को वास्तविकता मान लेता है। दलाल कोई भी बड़ी उपलब्धि, योग्यता या ईमानदार कार्य के आधार पर अपनी पहचान नहीं बनाते। वे इसे दृश्य नियंत्रण के स्तर पर बनाते हैं। उनकी छवि उनके चरित्र को ढक लेती है और यही दृश्य राजनीति की सबसे खतरनाक क्षमता है। लोकतांत्रिक समाज में व्यक्ति की पहचान उसके आचरण, पारदर्शिता और जिम्मेदारी से बननी चाहिए। तस्वीरें संबंधों का प्रमाण नहीं होतीं, पर वे ऐसा भ्रम ज़रूर पैदा करती हैं कि सब कुछ ठीक है, सब कुछ स्वीकार्य है। यदि समाज दृश्य को ही सत्य मानने लगे, तो सत्य स्वयं कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इसी में है कि हम यह समझें कि एक तस्वीर में दिखाई देने वाली निकटता अक्सर केवल एक क्षण का संयोग होती है, न कि किसी गहरे संबंध का प्रमाण। इसलिए ज़रूरी है कि नागरिक, संस्थाएं और समाज यह समझें कि तस्वीरें दलालों की सबसे बड़ी ढाल हैं। जितनी अधिक चमक, उतनी अधिक सावधानी की आवश्यकता है। दृश्य राजनीति की इस चाल को पहचानना, उसकी रणनीतियों को समझना और उसके प्रभाव से दूरी बनाना ही वह रास्ता है जिससे समाज भ्रम से निकलकर सत्य, जवाबदेही और नैतिकता के करीब आ सकता है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सजग जनता होती है, न कि तस्वीरों के आधार पर गढ़ी गई बनावटी पहचानें।
दलालों की सोची-समझी तस्वीरें और शक्ति प्रदर्शन का खेल












