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Sunday, March 15, 2026

सरकारी मशीनरी की खुली पोल,बाढ़ प्रभावित किसानों को आज तक नहीं मिला मुआवजा

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रायबरेली ब्यूरो | Raebareli Bureau | Raebareli Beuro

शिवगढ़ (रायबरेली)। सूबे की सरकार किसानों की आय दूनी करने के तो बड़े-बड़े दावे करती है। भोले-भाले किसानों को बड़े-बड़े सपने भी खूब दिखाती है। किन्तु सरकार की कथनी और करनी में कितना फर्क है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है। बरसात के दिनों में क्षेत्र की हजारों बीघे धान की फसल जल मग्न होकर चौपट हो गई। किंतु आश्वासन के बाद भी बाढ़ प्रभावित किसानों को आज तक मुआवजा नहीं मिल सका।
बताते चलें कि बांदा-बहराइच हाईवे पर स्थित शिवगढ़ रजबहा का पिपरी पुल बनाने के लिए पीडब्ल्यूडी विभाग ने सिंचाई विभाग की बगैर अनुमति सकरे होम पाइप डालकर मानक के विपरीत बाईपास बना दिया था, जिनसे बरसात का पानी पर्याप्त मात्रा में ना निकल पाने के कारण बहुदा, लालगंज, बेड़ारु, निडबल, गढ़ी, चितवनियां, गहोंबर, भैरमपुर, वजिदपुर, बैंती, शिवली सहित दर्जनों गांवों की हजारों बीघे धान की फसल जलमग्न हो गई थी, जिसको लेकर सड़कों पर उतरे आक्रोशित किसानों को देखकर पूर्व विधायक रामलाल अकेला ने जेसीबी मशीन से डायवर्जन तो करवा दिया था किंतु इसके बावजूद कटिंग से पर्याप्त मात्रा में बरसात का पानी ना निकल पाने के कारण किसानों राहत नहीं मिल सकी लिहाजा जलमग्न फसल चौपट हो गई, जिसका जायजा लेने पहुंचे एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह, क्षेत्रीय विधायक रामनरेश रावत व महराजगंज उप जिलाधिकारी शालिनी प्रभाकर ने समूचे बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर पीडि़त किसानों को मुआवजा दिलाने का आश्वासन दिया था। किंतु विडंबना है कि कई माह बीत जाने के बावजूद फसल बीमा कराने वाले किसानों में से चंद किसानो को छोड़कर अन्य किसी किसान को एक रुपया भी मुआवजा नहीं मिला। जिसको लेकर क्षेत्र के किसानों ने महराजगंज उप जिलाधिकारी को लिखित प्रार्थना पत्र देकर मुआवजा दिलाए जाने की मांग भी की किंतु सरकार की नीति चलते नतीजा शून्य। बाढ़ प्रभावित किसानों का कहना है कि उन्होंने किसी तरह किसान क्रेडिट कार्ड व दूसरों से कर्ज लेकर धान की रोपाई की थी जो जल मग्न होकर चौपट हो गई। बाढ़ पीडि़त अन्नदाता एक एक दाने को मोहताज हो गए। एक तरफ कर्ज की भरपाई तो दूसरी तरफ परिवार की जीविका चलाने की समस्या उनके लिए चुनौती बन गई। पीडि़त किसानों का कहना है कि सरकार की दोगली नीति के चलते ही भारतीय कृषक ऋण में जन्म लेता है और ऋण में मर जाता है। सरकार फसल बीमा को महत्वाकांक्षी बताकर ढिंढोरा तो खूब पीटती है किंतु फसल बीमा कराने के बावजूद जिन किसानों ने संबंधित संस्था से शिकायत करके अपने खेतों का सर्वे कराया था सिर्फ उन्हीं लोगों को फसल बीमा का लाभ मिल सका। इस प्रकार से फसल बीमा योजना सिर्फ जागरूक किसानों तक सीमित रही। इस प्रकार से फसल बीमा का सर्वे करने वाली संस्था की लापरवाही की वजह से इस योजना को भी ग्रहण लग गया।

अनुज मौर्य रिपोर्ट

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