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Wednesday, February 11, 2026

विकास दर बढ़ाने को बैंकों का एकीकरण

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रायबरेली ब्यूरो
जयंतीलाल भंडारी
इन दिनों केन्द्र सरकार देश के चार प्रमुख बैंकों इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को मिलाकर एक बड़ा बैंक बनाने की तैयारी कर रही है। यदि इन चार प्रमुख बैंकों का विलय होता है तो ऐसे में इनके विलय से जो एकीकृत बैंक आकार लेगा, वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक दिखाई देगा। इस नए एकीकृत बैंक की संपत्ति 16.58 लाख करोड़ रुपए की होगी।
गौरतलब है कि छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फार्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है। पिछले साल एक अप्रैल 2017 को एसबीआई के पांच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक (बीएमबी) का एसबीआई में विलय किया गया था। इसके तहत स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला और स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर 1 अप्रैल, 2017 से एसबीआई में समाहित हो गए। ऐसे में एसबीआई 37 लाख करोड़ रुपए की परिसंपत्ति के साथ दुनिया का 44वें क्रम का बड़ा वैश्विक बैंक बन गया। इसकी शाखाओं की संख्या करीब 22500 तथा एटीएम की संख्या 58 हजार तथा ग्राहकों की संख्या 50 करोड़ से अधिक है। भारत में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े बैंकों में सहायक बैंकों के विलय से उद्योग, कारोबार व विभिन्न वर्गों की कर्ज की बड़ी जरूरत पूरी हुई है। पिछले वर्ष 23 अगस्त, 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण में तेजी लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस कवायद का मकसद सरकारी बैंकों को सुद्दढ़ करना है। कहा गया है कि एक ओर सरकारी बैंक गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या से जूझ रहे हैं वहीं दूसरी ओर क्रेडिट ग्रोथ कई दशकों के निचले स्तर पर आ गई है। सरकार सरकारी बैंकों को मजबूत आकार देकर यह स्थिति पलटना चाहती है। देश और दुनिया के बैंकिंग विशेषज्ञों और रेटिंग्स एजेंसियों का कहना है कि भारत में सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण से कई लाभ होंगे। इससे जहां एक ओर बैंकों को परिचालन में लाभ होगा वहीं दूसरी ओर समान तरह के प्रदर्शन करने वाले बैंकों के विलय से एनपीए के समाधान की रणनीति को प्रभावी तरीके से लागू करने में भी मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि भारत एशिया की तीसरी बड़ी ऐसी अर्थव्यवस्था है जहां बैंकिंग सेक्टर में दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सेदारी सरकारी बैंकों की है। सरकार की रणनीति अगले 3 वर्षों में सरकारी बैंकों की संख्या घटाकर 10-12 करने की है। बाद में यह संख्या और घटेगी। सरकारी बैंकों के विलय के निश्चित आधार होंगे। एक ही इलाके वाले बैंकों का विलय होगा। बैंकों की पूंजी पर्याप्तता के बीच तालमेल बिठाया जाएगा। बैंकों के मुनाफे का भी ख्याल रखा जाएगा। प्रस्तावित विलय बैंकिंग कंपनीज एक्ट के तहत होगा। विलय की प्रक्रिया की पहल बैंकों के बोर्डों द्वारा की जाएगी। वैकल्पिक व्यवस्था के तहत प्रस्ताव को सैद्धान्तिक मंजूरी देने के बाद बैंकों को कानून तथा भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के नियम के मुताबिक विलय की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। विलय की अंतिम योजना को केन्द्र सरकार द्वारा आरबीआई की सलाह से अधिसूचित किया जाएगा। विलय की प्रक्रिया में किसी तरह के नकद सौदे नहीं होंगे बल्कि शेयरों की अदला-बदली होगी। यद्यपि सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण संबंधी मंत्रिमंडल के प्रस्ताव का संबंधित बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा विरोध किया गया है और विरोध का कारण विलय के बाद कर्मचारियों के हितों का नुकसान होना बताया गया है लेकिन सरकार ने कहा है कि जिन बैंकों का विलय होगा, उनके कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं के मामलों में कोई नुकसान नहीं होगा। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस कवायद में किसी भी कर्मचारी को नौकरी नहीं गंवानी पड़ेगी। सरकार का यह भी कहना है कि एक अप्रैल, 2017 को देश के इतिहास में जो सबसे बड़ा बैंकिंग एकीकरण हुआ, उसके पश्चात बैंकों के अधिकारियों और कर्मचारियों के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। वस्तुत: किसी देश का स्थिर बैंकिंग सिस्टम कुछ बड़े स्तंभों पर खड़ा होता है। ऐसा सिस्टम ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, थाईलैंड और मलेशिया जैसे बाजारों में मौजूद है। पिछले दिनों ग्लोबल क्रेडिट एजेंसी फिच द्वारा प्रकाशित बैंकिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की विकास दर बढ़ाने के लिए बैंकिंग संबंधी ऐसे प्रमुख सुधार की जरूरत है। वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देश के सरकारी बैंकों को मिलाकर कुछ बड़े बैंक बनाए जाने चाहिए। इससे डूबते बैंक कर्ज से अर्थव्यवस्था को बचाया जा सकेगा। देश में वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के लिए बनी नरसिम्हन समिति ने सबसे पहले बैंक सुद्दढ़ीकरण का विचार पेश किया था। निश्चित रूप से केन्द्र सरकार द्वारा सरकारी बैंकों के विलय को सैद्धांतिक मंजूरी के बाद बैंकों के विलय के परिदृश्य से देश में बैंकों को मजबूत बनाने और डूबते हुए कर्ज से गंभीर रूप से बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में महत्वपूर्ण सहयोग मिलेगा। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में पांच सहायक बैंकों के विलय के बाद यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि एसबीआई को अधिक सक्षम और बेहतर परिचालन वाला बैंक बनाने के लिए वाणिज्यिक तरीके से चलाने की इजाजत मिली है। एसबीआई के खर्चों में कटौती हुई है अधिक समन्वय के लिए सहयोगी बैंकों का सहयोग मिला है। एसबीआई की गतिविधियों पर निगरानी और पर्यवेक्षण बढ़ा है।
इन सभी बातों पर ध्यान दिए जाने से एसबीआई का विलय सफल सिद्ध हुआ है। ऐसे में अन्य मध्यम स्तर के बैंकों के भी विलय की डगर पर आगे बढऩे से लाभ होगा। ऐसा होने पर भारत के बैंकिंग जगत में कुछ बड़े बैंकिंग संगठन सक्रिय दिखाई दे सकेंगे। सरकारी बैंकों की ऐसी मजबूत स्थिति से वर्तमान परिवेश में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुके बैंकों के डूबते ऋण को रोकने, ऋण वृद्धि में तेजी से आ रही गिरावट को संभालने, तयशुदा लागत में हो रही तेज बढ़ोतरी को रोकने के लिए सरकार के रणनीतिक प्रयासों को सफलता मिल सकेगी। साथ ही बैंकों के सुद्दढ़ीकरण और बैंकिंग सुधारों की ऐसी डगर से उद्योग-कारोबार के साथ-साथ आम आदमी भी लाभान्वित होगा।
हम आशा करें कि जून 2018 में चार प्रमुख बैंकों के विलय से एक बड़ा बैंक बनाने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार बैंकों के विलय को अंतिम रूप देने के लिए तेजी से आगे बढ़ेगी। निश्चित रूप से बैंकों के एकीकरण से देश की विकास दर भी बढ़ेगी।

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