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Wednesday, February 11, 2026

रायबरेली में भी हुआ जलियावाला बाग जैसा गोलीकांड

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Anuj awasthi
Anuj awasthihttp://www.voiceofraebareli.com
Anuj Awasthi is a seasoned journalist and media professional with nearly two decades of experience in the field of journalism. He is currently serving as the Chief Editor of Voice of Raebareli and News Editor at Kanchan Today. He began his journalism career in 2006–07 with Bheera Express, marking the start of his long-standing engagement with grassroots and public-interest reporting. Over the years, Anuj Awasthi has worked with several well-known newspapers and publications, including United Bharat, Swatantra Bharat, Jansandesh Times, Dainik Hindustan, Shree Times, Daily News Activist, and Prakhar Vichar Patrika. His work spans reporting, editing, and editorial leadership, with a strong focus on social issues, local governance, and voices from the ground. Known for his commitment to factual journalism, editorial integrity, and public accountability, Anuj Awasthi continues to contribute actively to regional media, strengthening independent journalism at the grassroots level.
  • 13 अप्रैल 1919 को अमृसर में हुये जलियांवाला बाग काण्ड में अंग्रेज जनरल डायर की बर्बरता से सभी वाकिफ हैं, लेकिन रायबरेली के मुंशीगंज काण्ड के बारे में कम ही लोग जानते हैं। यहां भी हजारों किसानों को गोरे सिपाहियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। ७ जनवरी १९२१ को अंग्रेजों ने मुंशीगंज में सई नदी के तट पर निहत्थे किसानों पर गोलियां बरसाकर उनकी आवाज दबाने का प्रयास किया। इन निरीह किसानों के रक्त से नदी भी लाल हो गयी थी। रायबरेली का यह किसान आन्दोलन यद्यपि जलियांवाला बाग जितना चर्चित नहीं हुआ पर भारतीय राजनैतिक चेतना के विकास के क्रम में उसका महत्व किसी भी दृष्टि से जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड से कम नहीं है। जब भी इस देश का इतिहास किसान “दृष्टि” से लिखा जायेगा, रायबरेली अथवा अवध किसान के साहस, आत्म बलिदान से ओतप्रोत यश-गाथा गंगोत्री की तरह पवित्र और पूजनीय हो उठेगी। रायबरेली के लिए सन् 1921 ई. का वर्ष, मृत्यु के प्रहारों तथा शमशान के अभिसारों के उपहार लेकर आया था। वर्ष के प्रथम सप्ताह का एक-एक क्षण, रायबरेली के बलिदानी किसानों के रूधिर की बूंद-बूंद तैरकर अतीत तक पहुंचा। मुंशीगंज गोलीकाण्ड में इतने किसानों को गोली मारी गयी और बाद में इतने लोगों  को और गोली मारनी पड़ी कि यूपी पुलिस के शस्त्रागार में आपातकाल के लिए भी कारतूस सुरक्षित रखना कठिन हो गया, और तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन में अपनी क्रूरता तथा कूटनीतिज्ञता के लिए कुख्यात लखनऊ के कमीश्नर ले. कर्नल जेसी फाउंथर्प के व्यापक दमन चक्र तथा विशाल सेना शक्ति प्रदर्शन जिसमें एक डिवीजन भारतीय घुड़सवार, यूरोपियन सैनिकों को दो कंपनियां तथा मशीनगन धारियों का एक डिवीजन सम्मिलित था, के बाद भी रायबरेली के किसानों ने मातृभूमि पर बलिदान होने की परम्परा के यज्ञ-कुंड को प्रज्जवलित रखा और करहिया बाजार में तीन-तीन बार की गयी गोली वर्षा तक मानवीय अधिकारों तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष पूर्ण इतिहास को अपने निर्भय बलिदान, त्याग एवं असहयोग से समृद्ध करते रहे।
  • इसमें कोई संदेह नहीं कि इस गोली काण्ड के बाद यूपी सरकार ने रायबरेली के किसान आन्दोलन को कुचलने के लिए अभूतपूूर्व तैयारी की थी। यूपी के सभी जिलों की पुलिस किसानों की आवाज को  मौत के सन्नाटे में बदलने के लिए रायबरेली भेजी गयी थी। उसकी प्राण घातक उपथिति को रौंदकर सभाओं में एकत्र होना हंसी-खेल न था। यद्यपि सरकारी अभिलेखों के अनुसार मात्र आधा दर्जन किसानों की मौत हुई थी किन्तु उसे छिपाने के लिए कर्नल फाउंथर्प को सारी रात लारी तथा तांगों से लाशें ढुलवाने के बाद शेष दर्जनों लाशों को गड्ढों में तोपना पड़ा था। रायबरेली का मुंशीगंज ‘गोलीकाण्ड दीन-दलित तथा शोषित-पीडि़त किसानों मजदूरों द्वारा मरता क्या न करता के रूप में एक बलिदानी विद्रोह था। इस जिले के तालुकेदारों और शासनाधिकारियों के पक्ष में यदि मुशीगंज गोली काण्ड का अध्ययन करें तो  कहा जा सकता है कि यह संगठित किसानों द्वारा किया गया विद्रोह, जमींदारी तथा साम्राज्यशाही की जड़ों में मठ्ठा डालने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का आदर्श अध्याय था। यदि असहाय तथा निर्धन किसानों के निहत्थे विद्रोह की गतिशीलता में आत्म संकल्प का सर्वोत्तम इस्पात इतना अधिक न गला होता तो मुंशीगंज गोलीकाण्ड के साथ उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता और उसे राष्ट्रीय नेतृत्व का संरक्षण प्राप्त करने में सफलता न प्राप्त होती। यह गोली काण्ड दीर्घकालीन पराधीनता की भयानक अंधेरी रात तथा भविष्य के सुदूर क्षितिज पर स्वतंत्रता सूर्य के उदय की प्राथमिक ऊषा के मध्य अवस्थित सेतु को पार करने में घटी एक लहू-लुहान दुर्घटना के जीवन का इतिहास है। इस इतिहास की नींव की कोई ईंट उखड़ी या अनजुड़ी न रह जाये इसलिए यहां के किसानों ने गारा बनााने में पानी की जगह अपने रूधिर का उपयोग किया। मुंशीगंज गोलीकाण्ड में कई सौ हिन्दु-मुस्लिम किसानों ने पुलिस गोली वर्षा से मृत्यु का आलिंगन किया था। यह आधी रात के सूर्य की तरह पूर्णतया असत्य है कि भीड़ पुलिस पर पत्थरों की भीषण वर्षा कर रही थी। नदी तट की उस बालुई भूमि पर पत्थर थे ही नहीं। यह भी झूठ है कि भीड़ के लाठियां थी क्योंकि जिन कतिपय किसानों के पास कुछ लाठियां थी उन्हें मि. शेरिफ की मांग पर जमाकर दिया गया था। यदि भीड़ इतनी सशक्त स्थिति में होती तो इस गोलीकाण्ड का इतिहास किसानों के रूधिर से कम अंग्रेजों के खून से ही ज्यादा लिखा जाता। यद्यपि मुंशीगंज गोलीकाण्ड में हुई गोली वर्षा की अनुगूंज अभी भी रायबरेली जनपद की सीमाओं तक फैली हुई है। सेंहगों की बहादुर महिला कलेक्टर का उल्लेख किये बिना सन् १९२१ ई. का यह नरसंहार उपसंहार तक नही पहुंच सकता। उसका नाम बिलासा था और कुन्ती की तरह पंच पाण्डवों की विधवा माँ थी। कितने आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्रता संग्राम के उस प्राथमिक चरण में जिस समय ग्रामीण भारत की स्त्रियां पर्दों तथा दीवारों के भीतर सांस्कृतिक दासी प्रथा की आत्म स्वीकृतियों में डूबी हुई थी, उस समय भी रायबरेली में परंपराओं तथा रूढिय़ों की जंजीरों को तोड़ कर वृद्ध महिलायें भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर रही थीं। मुंशीगंज गोलीकाण्ड भारतीय स्वतंत्रा संग्राम की ऐतिहासिक परिस्थिति की पहली अंगडाई थी, जिसे सई तथा गंगा नदी के जल और सैकड़ों किसानों के ताजे रूधिर का तर्पण प्राप्त हुआ और इसीलिए यह काण्ड कालजयी बनकर अजर-अमर बन गया। आज शहीद दिवस पर रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की इन पक्तियों के साथ ज्ञात-अज्ञात शहीदों को शत-शत नमन व श्रद्धांजलि-

‘इन मिनारों की नींवों में उनकी लाशें सोयीं,

  नेतृत्वों की जड़े गईं उनके लोहू से धोयी।

  आजादी के बुर्ज उठे हैं उनके उत्सर्गों पर,

  जिनकी ईंट-ईंट में उनकी कुचली साधें सोईं॥

  आज चलो हम उनके घट पर साध्य प्रदीप जलायें

  उनके खूं से सिंचे पथों मैदानों में मंडऱायें॥’

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Anuj Awasthi is a seasoned journalist and media professional with nearly two decades of experience in the field of journalism. He is currently serving as the Chief Editor of Voice of Raebareli and News Editor at Kanchan Today. He began his journalism career in 2006–07 with Bheera Express, marking the start of his long-standing engagement with grassroots and public-interest reporting. Over the years, Anuj Awasthi has worked with several well-known newspapers and publications, including United Bharat, Swatantra Bharat, Jansandesh Times, Dainik Hindustan, Shree Times, Daily News Activist, and Prakhar Vichar Patrika. His work spans reporting, editing, and editorial leadership, with a strong focus on social issues, local governance, and voices from the ground. Known for his commitment to factual journalism, editorial integrity, and public accountability, Anuj Awasthi continues to contribute actively to regional media, strengthening independent journalism at the grassroots level.

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