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Sunday, March 15, 2026

आपातकाल के सबक भी सीखिए

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रायबरेली ब्यूरो
राजकुमार सिंह
आपातकाल को 43वीं बरसी पर कुछ ज्यादा ही याद किया गया। शायद यह कहना ज्यादा सही होगा कि इस बार कुछ ज्यादा ही याद करवाया गया। आपातकाल को भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास के काले दौर की संज्ञा दी जाती रही है। इसी कारण आपातकाल लागू किये जाने वाले दिन को हर साल काला दिवस के रूप में भी मनाया जाता रहा है। इस बार भी मनाया गया, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्री अरुण जेटली ने आपातकाल लागू करने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तुलना, बाकायदा लेख लिख कर, जर्मनी के नाजी तानाशाह हिटलर से की। उन्होंने सवाल भी उठाया कि आपातकाल की पटकथा कहीं 1933 के नाजी जर्मनी से प्रभावित तो नहीं थी। लंबे स्वतंत्रता संघर्ष के बाद 1947 में आजाद हुए भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में 25 जून की आधी रात अचानक आपातकाल लागू कर दिया था। तमाम राजनीतिक विरोधियों ही नहीं, आपातकाल का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक को जेल में डाल दिया गया था। बड़ी संख्या में राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को लगभग 19 महीने जेल में गुजारने पड़े, जब तक कि इंदिरा गांधी ने नये लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा नहीं कर दी। हरियाणा के वरिष्ठ मंत्री रामबिलास शर्मा ने हाल ही में कहा कि यंत्रणा देने के लिए आपातकालीन बंदियों के नाखून तक उखाड़ दिये गये थे। नयी पीढ़ी को शायद वैसी यातना अविश्वसनीय लगे, लेकिन इंदिरा शासन के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण जेल में रहने के दौरान ही जिस तरह, अंतत: प्राणघातक साबित हुई बीमारियों के शिकार हो गये, उससे उन यंत्रणाओं का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश में संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों का स्थगन और निरंकुश दमन तानाशाही की श्रेणी में ही आता है, जो हरगिज स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह इंदिरा गांधी के उस असंवैधानिक-अलोकतांत्रिक कदम का ही परिणाम था कि तीन दशक तक एकछत्र कांग्रेस शासन में रहे देश ने जयप्रकाश के दूसरी आजादी के आह्वान पर ऐसी अंगड़ाई ली कि छोटे और क्षेत्रीय दलों के विलय से जनता पार्टी के गठन का मार्ग ही प्रशस्त नहीं हुआ, केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार भी पदारूढ़ हुई। देशवासियों ने जता दिया कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र में उनकी आस्था को ज्यादा समय तक दबाया नहीं जा सकता। राजनीतिक असुरक्षा और पुत्र-मोह की शिकार इंदिरा गांधी ने चुनाव से बचने के लिए तानाशाहीपूर्ण तरीके से लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया था, जिसका जवाब जनता ने उन्हें और उनके बेटे संजय गांधी को चुनाव में परास्त कर दिया। वह एक बड़ा और जरूरी सबक था, नव स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दलों-नेताओं के लिए, पर कहना मुश्किल है कि उन्होंने उससे कोई सबक सीखा। खुद उस जनता पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा, जिसे इंदिरा गांधी की तानाशाही के परिणामस्वरूप अप्रत्याशित रूप से सत्ता तश्तरी में रखी जैसी मिल गयी थी। तत्कालीन जनता पार्टी नेताओं और उनके अनुयायियों के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन जनसाधारण की नजर से देखें तो वे खुद इंदिरा गांधी से कम अहमन्य साबित नहीं हुए, वरना 1977 में सत्ता से बेदखल की गयी इंदिरा की 1980 में ही अप्रत्याशित रूप से केंद्रीय सत्ता में वापसी नहीं हो गयी होती। बेशक जनता पार्टी सरकार ने कुछ जन कल्याण के कदम भी उठाये, लेकिन राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से कांग्रेसी राज्य सरकारें बर्खास्त करने से लेकर इंदिरा गांधी के विरुद्ध तरह-तरह के मुकदमे शुरू करने तथा प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के चलते अंतर्कलह से लेकर जनता पार्टी-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोहरी सदस्यता के सवाल पर उसके क्षत्रप ऐसे झगड़ालू नजर आये कि मतदाता उन्हीं इंदिरा गांधी और कांग्रेस को वापस सत्ता में ले आये, जिन्हें लगभग ढाई साल पहले ही बेदखल किया था।
दरअसल 1977 और 1980 के जनादेशों से सबक इंदिरा गांधी ने भी नहीं सीखा। अगर सीखा होता तो विमान दुर्घटना में संजय की मृत्यु के बाद अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को एयरलाइंस की नौकरी छुड़वा कर राजनीति में नहीं ले आतीं, और न ही अब अरुण जेटली को उन पर लोकतंत्र को वंशवादी लोकतंत्र में बदल देने का आरोप लगाने का मौका मिलता। बेशक कांग्रेस से शुरू हुई वंशवादी राजनीति की इस बीमारी ने अब उन दलों को भी कहीं ज्यादा भौंडेपन से अपनी गिरफ्त में ले लिया है, कभी कांग्रेस की वंशवादी राजनीति जिनका सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा हुआ करता था। माना कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह क्रमश: भारत और भाजपा के सर्वोच्च पद पर वंशवाद की बदौलत नहीं पहुंचे हैं, लेकिन इस बीमारी से अछूती तो आज भाजपा भी नहीं है। प्रदेशों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक भाजपा में भी वंशवादी राजनीति के अंतहीन उदाहरण दिये जा सकते हैं। दरअसल वंशवादी राजनीति के मामले में अब भारत में वाम दल ही अपवाद रह गये हैं। तानाशाही से शुरू हुई यह चर्चा वंशवाद तक इसलिए भी पहुंच गयी, क्योंकि इंदिरा गांधी जन्मजात तानाशाह नहीं थीं। जिस भाजपा के नेता आज इंदिरा गांधी की तुलना हिटलर से कर रहे हैं, उसी के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने 1971 में भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश के पृथक देश बनने पर इंदिरा का गुणगान करते हुए उन्हें दुर्गा बताया था। आखिर 1971 की दुर्गा से इंदिरा गांधी 1975 में तानाशाह कैसे बन गयीं? दरअसल इस स्वाभाविक सवाल का जवाब खोजे बिना आपातकाल से जरूरी सबक सीखा ही नहीं जा सकता। बेशक जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस का नेतृत्व भी कमोबेश उन्हीं के हाथ रहा, लेकिन तब कांग्रेस में दूसरे ऐसे दिग्गज नेता भी थे, जिनमें उनसे असहमति जताने का साहस था। नेहरू भी उनकी बात सुनते अवश्य थे, लेकिन कांग्रेस विभाजन के बाद भी 1971 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त जीत ने लोकतांत्रिक तरीके से ही प्रधानमंत्री चुनी गयी इंदिरा गांधी के अति आत्मविश्वास को अहमन्यता में बदल दिया। अहमन्यता अंतत: अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ही जन्म देती है। इसीलिए कांग्रेस सरकारों में मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों के नाम पार्टी में चर्चा के बजाय इंदिरा गांधी की पसंद से तय होने लगे। तमाम दिग्गज कांग्रेसियों के विरोध में गोलबंदी के चलते इंदिरा सलाह के लिए अपने इर्दगिर्द की चौकड़ी के अलावा छोटे बेटे संजय पर ही निर्भर हो गयीं। पुत्र-मोह की महाभारतकालीन घातक बीमारी से इंदिरा गांधी भी नहीं बच पायीं। राजनीतिक असुरक्षा की उसी भावना से अंतत: वंशवाद की भावना भी प्रबल हुई। इस सबकी परिणति ही ‘इंदिरा इज इंडिया के शर्मनाक नारे और आपातकाल के रूप में हुई। इसलिए आपातकाल का सबसे जरूरी सबक है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र मजबूत हो, वंशवाद से मुक्ति सुनिश्चित हो तथा नेता का कद दल से बड़ा न हो जाये। क्या भाजपा समेत किसी भी दल ने यह सबक सीखा है? अगर Ó70-80 के दशक में इंदिरा गांधी का कद कांग्रेस से बड़ा हो गया था तो क्या आज मोदी का कद भाजपा से बड़ा नहीं हो गया है? क्या भाजपा ने भी उसी तरह आंतरिक लोकतंत्र को दरकिनार कर हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तय नहीं किये? आपातकाल की याद ताजा कराना गलत नहीं है, पर देशहित में उसके वांछित परिणाम तभी निकलेंगे, जब जरूरी सबक सीखे जायेंगे, वरना यह चुनावी लाभ प्रेरित दलगत राजनीतिक दांवपेंच मात्र ही रहेगा।

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